Sunday, September 7, 2008

हिंदी की छटाएँ

बस में दो पहाड़ी चढ़े थे। वे अपनी ही भाषा में बात कर रहे थे। स्वाभाविक है। लेकिन जब आप पहाड़ी प्रदेश की यात्रा करते हैं तो हिंदी की छटा देखकर मन पुलकित हो जाता है। कहाँ की हिंदी कहाँ आ गई। फिर भी हमारे हिंदी वाले संतुष्ट नहीं होते। वे अपनी तुलना अंग्रेजी से करते होंगे। शिलांग में एक खासी युवक रेस्तरां में कुछ खा रहा था। एक दक्षिण भारतीय ने सोचा कि वह जो खा रहा है वह चीज मैं लूँ या नहीं। पता नहीं कैसी हो। उसने पूछा - भाई कैसा-कैसा। उसने कहा - हाँ खासिया-खासिया। यानी हाँ मैं खासिया (यानी खासी) हूँ।

एक दिन बस में मेरे साथ खासी मजदूर जा रहा था। बाहर एक स्थान पर दिखाकर बोला - बाबू, कल हम यहाँ पर गिरेगा। मुझे अचरज हुआ। यह कल यहाँ गिरेगा, इसे आज ही कैसे पता चल गया। पूछा - कैसे गिरेगा।
-साइकिल से गिरेगा, बाबू।
-साइकिल से गिरेगा? कैसे मालूम?
- कैशा बात करता। हाम गिरेगा, और हामको मालूम कैशे नहीं होगा। बहोत चोट लगता बाबू।
मैं अब तक समझ गया कि यह कल उस जगह साइकिल से गिर पड़ा था।

अरुणाचल में हिंदी के चित्र और भी रमणीय हैं। एक डाक्टर को खोजने निकला था। पहाड़ी शहर में स्थान खोजने में मुझे हमेशा दिक्कत होती है। मैंने साथ में एक स्थानीय मित्र को ले लिया। स्थानीय मित्र ने इस तरह मेरी मदद की-

ऐ भाई, इधर एक डाक्टर बैठता, आपको मालूम?
- डाक्टर, इधर में तो कोई डाक्टर नहीं बैठता। अच्छा-अच्छा पहले एकठो डाक्टर बैठता था, आजकल तो वो हियां नहीं बैठता। उधर नीचे का तरफ खबर करो।

मुझे संदेह हुआ कि मैं किसी डाक्टर को खोज रहा हूँ या किसी खोमचे वाले को।

बस अपने स्टाप पर रुके बिना चल दी। दोनों पहाड़ी युवक चिल्ला उठे। अय रुको-रुको, हम यहां गिरेगा।

मेरे सहयात्रियों का गंतव्य आ गया था। वे गिरना चाहते थे।

2 comments:

SANTOSH K AGGARWAL said...

महान बस यात्री को प्रणाम. आज जान कर अच्छा लगा कि यात्री केवल संदेवंशील ही नहीं बल्कि जीवन की हलकी फुल्की छ्टाओं पर भी उसकी नजर है. बदलाव के लिए ही सही,आज का प्रसंग अच्छा लगा.

Katha-Vyatha said...

बहुत सुन्दर ! नीचे खबर करो।
शम्भु चौधरी