Sunday, September 6, 2009

कहाँ से शुरू करूँ

लंबा व्यवधान पड़ गया। ब्लॉग भी क्या जुनून की तरह है? केवल जुनूनी होने से कैसे काम चलेगा। क्या कारण होते हैं जब लिखना बिल्कुल रुक जाता है? आंतरिक सूखा पड़ता होगा या फिर आती होगी कोई आंतरिक आर्थिक मंदी।


इन दिनों सीटी बस से यात्रा कम कर दी। अभी-अभी दस किलोमीटर तक धूल और धुआँ खाकर आ रहा हूँ। सीटी बस में कुछ गुण हैं और कुछ अवगुण, उसी तरह स्कूटर के अपने गुण-अवगुण हैं।
हिंदी को लेकर असम में एक वातावरण बनाया जा रहा है। आखिर यह किसका दोष है। शायद ज्यादा मीडिया होने का यह खामियाजा समाज को भुगतना पड़ता है। याद आते हैं वे दिन जब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का जहाज ऊपरी असम में किसी गांव में गिर पड़ा था और हमें दूसरे दिन अखबार से पता चला। आज का दिन होता तो क्या होता? चैनल वालों को दो दिनों का काम मिल जाता। मीडिया के प्रति एक अंदरूनी वितृष्णा क्यों जन्म ले रही है?

Friday, November 7, 2008

मैं ही

वो मैं ही तो था
जिसके चीथड़े बटोरकर
साफ कर रहे थे तुम जमीन

मेरे ही कटे पांव को
छापा था अखबार ने
और मैं ही उसे देखकर
कांप उठा था उस रोज सुबह

मेरा ही खून बहा था
सड़कों पर
और मेरा ही खून
चढ़ रहा था बोतलों से

Tuesday, November 4, 2008

गुवाहाटी की कविता


दफ्तर से देखा कि विस्फोट का धुंआ उठ रहा है और वह मेरे भीतर जमा हो रहा है।

कितने विस्फोट हुए
खबरची पूछ रहे थे
गिनती पूरी नहीं हुई थी
मेरे अंदर विस्फोट जारी थे

इतनी बार
मरा मैं
मौके पर और अस्पताल में
कि और
मरने की
ताकत नहीं बची।

Tuesday, October 28, 2008

दीपावली की उदासी


हर दूसरे पर्व की तरह आज दीपावली के दिन भी मन उदास हो गया। मैंने इसका कारण खोजने की कोशिश की लेकिन खोज नहीं पाया। क्या इसका कारण यह है कि सालों से एक ही तरह की चीज में अब कोई रस नहीं रह गया। जैसे अखबारों में इस अवसर पर निकलने वाले - दिए का संदेश, अंधरे पर प्रकाश की विजय - जैसी उन्हीं उन्हीं बातों में कोई दिसचस्ली नहीं जग पाती। अब पटाखों, मिठाइयों में कहाँ से दिलचस्पी पैदा करें।

Monday, September 22, 2008

बाल कविता


सिटी बस सिटी बस
इंडियन सिटी बस
देश का आईना है
इंडियन सिटी बस

खाली गाड़ी खाली गाड़ी
आइए छूटेगी अब
इसकी है खासियत
ठेलमठेल ठसमठस

कोई निकला दफ्तर को
स्कूल कोई जा रहा
घुटन होती, देर होती
प्यारी फिर भी सिटी बस
(पाठक इसे आगे बढाएँ)

Tuesday, September 16, 2008

गर्वीली घोषणा


आँखें हर एक सवारी के चेहरे को पढ़ते हुए यह जानने का प्रयत्न कर रही थीं कि कौन कहाँ उतरने वाली है - ताकि हमारी टांगों को भी थोड़ा आराम मिले। तब तक बगल में पीछे की ओर एक सवारी का ऊंचा स्वर सुनाई दिया। किराया देंगे जी - किराया देंगे जी। मैंने ध्यान से देखा - कंडक्टर किसी सवारी को जबरन उतार रहा था। वह चालीस की उम्र वाला (पचास का दिखाई देता था) आदमी किराया देने की दुहाई दे रहा था। और ध्यान देने पर समझ में आया कि वह आदमी आंखों से देख नहीं पाता था। कंडक्टर सोच रहा था कि यह मुफ्त में यात्रा करना चाहता है। लेकिन सगर्व किराया देने की घोषणा करने वाले उस नेत्रहीन ने कंडक्टर को नीचा दिखा दिया।

Friday, September 12, 2008

जान-पहचान


आज नया क्या था। बस खिड़की के बाहर दिखाई देने वाले बिग टीवी के नए होर्डिंग। वोडाफोन के आने की सूचना देने वाले नए विज्ञापन। लड़िकयों के कालेज के बाहर उनका जुलूस। वोट फार अमुक के नारे। नया खोजते-खोजते स्टेशन के पास का स्टापेज आ गया था। एक युवक चढ़ा। उसकी एक आँख पर पट्टी बँधी थी। कोई भयंकर चोट लगी होगी। सर का अधिकतर भाग पट्टी से ढका हुआ था। मेरे आगे जो व्यक्ति बैठा था वह एक अधेड़ मुसलमान था। उसका पहनावा उसके धर्म के बारे में कह रहा था। लंबी सफेद हो रही दाढ़ी तथा लूंगी। उस पट्टी बँधे युवक को देखते ही वह उठ खड़ा हुआ। उसे सीट देने के लिए। युवक के हाथ में भारी-भरकम बैग था। शायद कहीं बाहर से आया था। वह तुरंत उस सीट पर काबिज नहीं हो गया। उसने पूछा क्या आप यहीं उतरने वाले हैं। मुसलमान अधेड़ बोला, नहीं। तो फिर बैठिए। नहीं आप बैठिए। इस तरह उस अधेड़ ने उस युवक के लिए सीट छोड़ दी। थोड़ी ही देर में उस अधेड़ को भी फिर से सीट मिल गई। कितना अच्छा लगता है जब कोई किसी के लिए सीट छोड़ता है। अच्छा लगा कि हमारे यहाँ भी पहले आप-पहले आप चलता है। अजनबियों के बीच भी। विनोद कुमार शुक्ल की वो कविता याद आ गई - उसकी आँखों में दुख था, और मैं दुख को पहचानता था।

 
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