Tuesday, November 4, 2008

गुवाहाटी की कविता


दफ्तर से देखा कि विस्फोट का धुंआ उठ रहा है और वह मेरे भीतर जमा हो रहा है।

कितने विस्फोट हुए
खबरची पूछ रहे थे
गिनती पूरी नहीं हुई थी
मेरे अंदर विस्फोट जारी थे

इतनी बार
मरा मैं
मौके पर और अस्पताल में
कि और
मरने की
ताकत नहीं बची।

8 comments:

ajatshatru said...

विस्फोटों का धुंवा किसे के दिल में जाता है- औत वो परेशां हो जाता है, पर यही धुंवा नेताओं के आँखों में जाता है और धुन्धियाई आँखों से उन्हें लोगो की पीड़ा नहीं दीखाई देती.
अजातशत्रु

shama said...

Uf ! Kaisee dardnaak awasthaka bayan hai....kaash har Hindustaneeke manse yahee baat ubhare, to desh jee uthe...kamse kam samvedansheel to ho jay...aapse ek guzarish hai....maine kuchh kavya rachnayen post kee hain...wo milengee 2007 ke June/July ke archives me. Tatha ek lekhbhee hai," Pyarki Raah Dikha Duniyako...",jo Gujraatme hue qaumee fasadonke baad ek aah banke kagazpe utar aaya tha...

ई-हिन्दी साहित्य सभा said...
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ई-हिन्दी साहित्य सभा said...

आदरणीय विनोद जी,
आपकी रचना काफ़ी भावनात्मक शब्दों को समेटे हुए है। बहुत ही सुन्दर शब्दों में पिरोया है आपने
कितने विस्फोट हुए
खबरची पूछ रहे थे
गिनती पूरी नहीं हुई थी
मेरे अंदर विस्फोट जारी थे

आपकी इस रचना को कवि मंच में भी प्रकाशित किया गया है। - शम्भु चौधरी, संचालक
http://kavimanch.blogspot.com/

हरि said...

एक संवेदनशील व्‍यक्ति कई-कई बार मरता है।

संजय बेंगाणी said...

धमाके चाहे कहीं भी हो...जब लोग मरते है तो आघात लगता है. कोई पहचान का व्यक्ति हो तो अर भी दुखद होता है. वहीं कोई जानी-पहचानी जगह हो तो मन खराब होता है. मैं कई वर्ष गुवहाटी रहा, जहाँ जहाँ विस्फोट हुए वे जगहे जानी पहचानी-सी थी अतः ज्यादा दुख हुआ.

Neelima said...

कविता बहुत दर्द लिए है !

Harkirat Haqeer said...

विनोद जी, आपका ब्‍लाग देख कर आश्‍चर्य मिश्रित खुशी हुई। आपकी दोनों कविताएं तो कल मैं सुन ही चुकी हूँ
बहुत ही संवेदनशील कविताएं हैं। ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है।