वो मैं ही तो था
जिसके चीथड़े बटोरकर
साफ कर रहे थे तुम जमीन
मेरे ही कटे पांव को
छापा था अखबार ने
और मैं ही उसे देखकर
कांप उठा था उस रोज सुबह
मेरा ही खून बहा था
सड़कों पर
और मेरा ही खून
चढ़ रहा था बोतलों से
Friday, November 7, 2008
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5 comments:
कविता अच्छी बन पड़ी है बिनोद जी, बढ़ते जाईये.
मैं ही तो हूँ
जिसे हर बार मारा जाता है
सत्ता द्वारा,
सत्ता बिरोधियों द्वारा
मैं ही तो हूँ
जिस के सब्र का पैमाना
कभी नहीं छलकता है
मैं ही तो हूँ
जो अपने रोशनदान पर
उल्लुओं को बैठाता हूँ.
ओमप्रकाश
very good...
बिनोद जी, बहुत बढ़िया लिखा है..
I saw this blog by chance. I did not know that you write such beautiful poems.
Nice to see a poem by a journalist
Vishnu Rajgadia
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