Friday, November 7, 2008

मैं ही

वो मैं ही तो था
जिसके चीथड़े बटोरकर
साफ कर रहे थे तुम जमीन

मेरे ही कटे पांव को
छापा था अखबार ने
और मैं ही उसे देखकर
कांप उठा था उस रोज सुबह

मेरा ही खून बहा था
सड़कों पर
और मेरा ही खून
चढ़ रहा था बोतलों से

8 comments:

O.P. Agarwalla said...

कविता अच्छी बन पड़ी है बिनोद जी, बढ़ते जाईये.

मैं ही तो हूँ
जिसे हर बार मारा जाता है
सत्ता द्वारा,
सत्ता बिरोधियों द्वारा

मैं ही तो हूँ
जिस के सब्र का पैमाना
कभी नहीं छलकता है

मैं ही तो हूँ
जो अपने रोशनदान पर
उल्लुओं को बैठाता हूँ.

ओमप्रकाश

Anonymous said...

very good...

rajkumar sharma said...

बिनोद जी, बहुत बढ़िया लिखा है..

Onkar said...

I saw this blog by chance. I did not know that you write such beautiful poems.

Vishnu Rajgadia said...

Nice to see a poem by a journalist
Vishnu Rajgadia

संतोष अग्रवाल said...

बहुत अच्छा लिखा है. आपको कवि के रूप में देख कर सुखद आश्चर्य हो रहा है.

Vijay Kumar Sappatti said...

kya baat hai sir ji,

itni acchi kavita ki man ro padha .

bahut bahut badhai


vijay
poemsofvijay.blogspot.com

ARVI'nd said...

nice to see your poem.....nice poem