Sunday, October 10, 2010

मैगजीन

और क्या चाहिए?
मैगजी..न
मैगजीन कहने से नहीं होगा..
फे - फैमिना ....वीक...
फैमिना है क्या जी?
वह एक दुबला-पतला लड़का था। नई स्पोर्टिंग पहने था। शायद कल-परसों ही खरीदी होगी। पूजा की खरीदारी में अस्त-व्यस्त। साथ में सलवार-सूट पहले पत्नी और दो छोटे-छोटे बच्चे अपनी माप से बड़े पैंट पहने हुए। शायद अभी कक्षा एक तक भी नहीं पहुँचे हों। पत्नी सूची देखकर बता रही थी, क्या खरीदना बाकी रह गया। लड़के की वेशभूषा बता रही थी शायद किसी सरकारी दफ्तर में चपरासी होगा, किसी के यहां ड्राइवर होगा, या सरकारी नौकरी की आस में किसी बड़े सरकारी अधिकारी के यहाँ काम कर रहा होगा। बच्चे लगता है किसी अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहे हैं।
दुकानदार ने फैमिना सामने रख दी। पारदर्शी कागज में पैक।
इसे खोलकर देख सकते हैं? दुकानदार के हां कहने पर उसने उसे सावधानी से खोला। पत्नी ने कहा देख लो भीतर तस्वीरें हैं या नहीं। आमुख पर हरी आँखों वाली अभिनेत्री मुस्कुरा रही थी। पति के पास उसकी ओर देखने का वक्त नहीं था। बच्चों की चीज है, एक बार बच्चों को दिखा लेना ठीक रहेगा। उसने बच्चों को अंदर के पृष्ठ दिखाए। देख लो, ठीक है न?
बच्चे - देखें - देखें यह क्या है...
पिता - यह सब साड़ियाँ हैं, बाद में देखना। दुकानदार से पूछा- ठीक है न मैग..मैगजीन।
दुकानदार ने हाँ में सिर हिलाया। उसके लिए ग्राहक भगवान था।
चलिए पैक कर दीजिए। हरी आँखों वाली अभिनेत्री फिर से पारदर्शी कागज में पैक हो गई, पचास रुपयों के भुगतान के बाद लड़के के झोले में चली गई।
पत्नी - अच्छा यही है क्या मैगजीन? इसे ही मैगजीन कहते हैं!
हाँ तो। बच्चों की रोज-रोज की नई फरमाइशों से परेशान पति बोला।
आज विशाल भारतीय मध्य वर्ग में एक नया परिवार शामिल हो गया।
फेमिना के पृष्ठों की कुछ तस्वीरें बच्चों के काम आएंगी और आमुख की ऐश्वर्या राय पिता के। दोनों के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव होगा।

1 comment:

वन्दना said...

बडी गहरी और सटीक बात कही है।