Saturday, May 17, 2008

नौकरी यात्रा

मैं उस पर नजरें गड़ाए था और सीट खाली हो चुकने के बावजूद मुझे पता नही नहीं चला था। मुझ जैसे अनुभवी सिटी बस यात्री के लिए यह कैसे मुमकिन हुआ। खैर देर ज्यादा नहीं हुई थी, मैं बैठने को उद्यत हुआ, कि वह लड़का भी बैठने को आगे बढ़ा। सीट तो मुझे ही मिलेगी, फिर भी सभ्यता की खातिर मैंने पूछ लिया - आप बैठेंगे। उसने कहा - बैठिये, बैठिये। वह दरवाजे का हैंडल पकड़े खड़ा ही रहा। वाह कैसा सभ्य लड़का है। उसके साथ और भी दो लोग थे। उसे भी थोड़ी देर में सीट मिल गई। वह चुपचाप था। डरा हुआ सा। काफी देर के बाद उसने अपने अभिभावक जैसे उम्र में बड़े साथी (शायद बड़ा भाई) से पूछा - उसका फोटोस्टेट तो नहीं लाए। गला सूखा हुआ था। शायद प्राइवेट में इन सबकी जरूरत नहीं होती। उसे सिटी बस की सीट से मतलब नहीं। उसके सामने बड़ा लक्ष्य है। नौकरी पाना है। बड़े भाई ने कमीज की जेब में दस्तावेजों को गोल कर खोंस रखा था। सस्ते कैनवैस की शू फैलाए वह आराम से बैठा। मोबाइल पर कसी नवो दा का फोन आता है। कहां तक पहुंचे।
अरे गाड़ी को लेकर प्राब्लेम हो गई। सरकारी अस्पताल तक पहुंचा हूं। बस पहुंच जाऊगा। काफी मुलामियत से उसने कहा।
कोई बात नहीं मैं इन्हें रोके हुए हूं। आ जाओ।
साथ वाला इस फोन को लेकर काफी बातें करता है। किसी प्रभावी शुभचिंतक ने उन्हें नौकरी पर लगाने का बीड़ा उठाया है शायद।
अरे सीधे पूछ दिया कहां तक पहुंचे। मैं तो शुरू में समझ में ही नहीं पाया कौन है। मैं नवो बोल रहा हूं। दोनों हंसते हैं। नवो पर दोनों को पूरा विश्वास है। ग्रामीण खुले आसमान के दो स्वतंत्र पंक्षी शहर के पिंजरे में बंद होने के लिए बेताब थे।

1 comment:

Amit K. Sagar said...

सबकुछ बहुत उम्दा. लिखते रहिये. और भी अच्छा लिखे, कामना करते हैं. शुभकामनायें.
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उल्टातीर: ultateer.blogspot.com