Diary of a Writer
This is a literary blog about the lively experience of an Indian journalist.
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Tuesday, November 4, 2008
गुवाहाटी की कविता
दफ्तर से देखा कि विस्फोट का धुंआ उठ रहा है और वह मेरे भीतर जमा हो रहा है।
कितने विस्फोट हुए
खबरची पूछ रहे थे
गिनती पूरी नहीं हुई थी
मेरे अंदर विस्फोट जारी थे
इतनी बार
मरा मैं
मौके पर और अस्पताल में
कि और
मरने की
ताकत नहीं बची।
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